मॉरीशस
सिलिया और मातादीन बचपन से पड़ोसी हुआ करते थे। दोनों साथ खेले और बड़े हुए। बाद में सिलिया के घर – परिवार में तंगहाली आने से वह स्वयं जान न पायी कैसे वेश्यावृत्ति के लिए विवश हो गई। मातादीन वहीं गाँव के मंदिर का पुजारी हुआ। अब वे पड़ोसी न हुए। मातादीन को मंदिर वाला पुजारी का घर मिला। यहाँ सिलिया अपने ही घर में मर्दों के लिए भोग्या हुई।
मातादीन उसके यहाँ छिप छिपा कर आया करता था। एक दिन आने पर उसने सिलिया को एक मंगलसूत्र दिखाया। यह उसे रास्ते पर मिला था। उसने सिलिया से कहा किसी तरह बेच दो पैसा आधा – आधा ले लेंगे। सिलिया का मन मंगलसूत्र पर चला गया। उसने स्वयं मंगलसूत्र खरीद लेना चाहा। मातादीन को कोई एतराज नहीं था। दोनों एक दाम पर पहुँचे। सिलिया ने उसे पैसा दिया और मंगलसूत्र अपने पास रख लिया।
उसी गाँव का सज्जन ओंकार एक दिन सिलिया का सहवास पाने आया। पर वह उदास था। सिलिया ने उसकी उदासी का कारण पूछा तो उसने बताया उसकी श्रीमती का मंगलसूत्र रास्ते पर कहीं गिर गया। बहुत ढूँढने पर मिला नहीं। लोगों से बहुत पूछा, लेकिन धनी घर का महंगा माल होने से आशा न के बराबर है कि कोई लौटाए।
सिलिया बोली, “मान लो मंगलसूत्र मुझे मिला हो और मैं तुम्हें देना चाहूँ तो लोगे?”
ओंकार ने उसे डाँट कर कहा, “इस तरह की हँसी ठिठोली मुझसे फिर मत करना। तुम्हारे यहाँ से मंगलसूत्र मेरी पत्नी के गले में जाए यह मेरे धरम के विरुद्ध है।”
सिलिया उसका तेवर जान लेने से प्रत्यक्षता से बोली नहीं कि उसकी पत्नी का मंगलसूत्र यहाँ है। उसके जाने के बाद सिलिया सोच में पड़ी। उसने मातादीन को अपने यहाँ बुला कर उससे कहा मंगलसूत्र ओंकार की पत्नी का है। मातादीन ने बेचा और सिलिया ने खरीदा। पर सिलिया पैसे की बात नहीं करती। वह बस चाहती थी जिसका मंगलसूत्र है उसे वापस मिल जाए। उसने मातादीन को मंगलसूत्र दे कर कहा किसी तरह उपाय रच कर ओंकार तक पहुँचा दे। सिलिया ने उसे यह कह कर चेताया इस मंगलसूत्र के लिए उसे पैसा मिल गया है। अब बेईमानी करे तो परिणाम बुरा होगा। वह तो मातादीन के दिल की ही बात कर रही थी। मंगलसूत्र हाथ आया तो मातादीन बेईमानी करता। पर उसे मानना पड़ता सिलिया से उसकी टक्कर होने वाली है। आश्चर्य नहीं, सिलिया उसे अपने इस घर में नंगा कर के रास्ते पर दौड़ाये और लोगों से कहे देखो पुजारी मेरे यहाँ से नंगा हो कर जा रहा है।
मातादीन ने ओंकार के घर जा कर कहा, “मैंने आज ही मंदिर में भक्तों को कहते सुना तुम्हारी श्रीमती का मंगलसूत्र रास्ते पर गिर गया था। क्या यह सच है?”
ओंकार के हाँ कहने पर उसने कहा, “मैं राम – राम जपते रास्ते पर जा रहा था कि मंगलसूत्र दिखाई दिया था। मंगलसूत्र था तो मेरे लिए समझने की बात हो गई किसी सुहागन के सुहाग की पवित्र निशानी है। मैंने ले जा कर मंदिर में देवी माई के पीछे रख दिया है। अब चलो वहीं से ले लो।”
ओंकार की खुशी अपरंपार हुई। उसने आवाज दे कर श्रीमती को सूचना दी, “भयवा मातादीन एक शुभ संदेश ले कर आया है। मंगलसूत्र मिल गया। भयवा ने देवी के मंदिर में बड़े जतन से रख दिया है। अभी ही तैयार हो जाओ। मंदिर चलते हैं।”
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लघुकथा
रामदेव धुरंधर
मॉरीशस
