Latest Updates

ग़ज़ल : डा. अफ़रोज़ आलम-कुवैत

ग़मों ने घेर लिया जब मुझे ख़ुशी की तरह
तुम्हारी याद का साया था ज़िन्दगी की तरह

तेरे ख़्याल की वादी में गुम हुआ जो कभी
ये आंख बहने लगी मनचली नदी की तरह

है एहतियात में डूबा हर एक हर्फ़ उसका
वो ख़त भी लिखता है मुझको तो शायरी की तरह

गिला मैं कैसे करूं उसकी बेवफ़ाई का
बिखर गया जो मेरे घर में चांदनी की तरह

अजब है शौक कि है सांप आस्तीनों में
वो दुश्मनी भी निभाते हैं दोस्ती की तरह

मेरे ख़्याल के आंगन में तब वो रक़्स करे
मेरा मिज़ाज हो जिस वक़्त बांसुरी की तरह

कि दिल ने जिसको पुकारा है ख़्वाब में ‘आलम’
मिला है आज वो कैफ़े में अजनबी की तरह

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *