अब नहीं रही
घुमंतु परिवार में भीख के रोजगार में, वह चलने से लाचार टांगें अब नहीं रहीं। रीते घड़े की पहेलियां दाना खोजती उंगलियां, वह पेट की पीड़ाएं अब नहीं रहीं। दिन में लकड़ी बीनना रात के लिए सहेजना, वो आग तापती रातें अब नहीं रहीं। कलुआ कई दिनों से आया नहीं शहर से, वो बेटे को…
