मैं ख़ुद को ख़ुद लिखूँगी
मैं ख़ुद को ख़ुद लिखूँगी,
और ख़ुद को ख़ुद ही पढ़ूँगी।
इन काग़ज़ के पन्नों में छिपी
मेरी अनगिनत कहानियाँ
मेरी आँखों के आँसू ख़ुद पोंछेंगी।
मेरा घर कहाँ है?
मेरा ठिकाना कहाँ है?
शायद इन काग़ज़ के पन्नों में
मेरी पहचान छिपी होगी।
मेरे इन मज़बूत कंधों के भीतर
रोते हुए एक बेबस दिल की कहानी लिखूँगी।
हज़ारों की भीड़ में खड़े होकर भी
अकेलेपन का एहसास करने वाले
अपने मन की व्यथा लिखूँगी।
अपने तकियों को गवाह बनाकर
हर रात बहे आँसुओं का हिसाब लिखूँगी।
अंदर ही अंदर हज़ारों बार टूटकर भी
सबके सामने चट्टान बनकर खड़ी रही,
उस साहस का इतिहास लिखूँगी।
कई बार गिराया गया मुझे,
कई बार तोड़ा गया मुझे,
लेकिन मैं फिर कैसे उठी?
अपने ही घावों को ताक़त बनाकर
चट्टान की तरह कैसे खड़ी हुई?
वह कहानी भी लिखूँगी।
क्योंकि मेरी ख़ामोशी कमज़ोरी नहीं,
मेरी मुस्कान दर्द का अंत नहीं।
मेरे भीतर एक तूफ़ान है,
एक समंदर है,
और उस समंदर की गहराइयों में
आज भी एक सपना ज़िंदा है।
अब मैं सिर्फ़ दूसरों के लिए नहीं,
अपने लिए भी जीऊँगी।
अपने घावों को शब्द दूँगी,
अपने आँसुओं को कविता बनाऊँगी,
और अपनी ही जीवन-पुस्तक में
अपने संघर्ष का इतिहास लिखूँगी।
मैं ख़ुद को ख़ुद लिखूँगी,
मैं ख़ुद को ख़ुद ही पढ़ूँगी।
क्योंकि मेरी कहानी अधूरी नहीं,
अभी तो कई पन्ने लिखना बाक़ी है।
ललितपुर ,नेपाल
