कविता : बिखरा बसंत
समज्ञा स्थापक गाडरवारा ढूंढ़ रही हूॅ बासंती बयार को सुना है पीली हो जाती है धरा सुना है मुसकुराने लगते हैं वृक्ष सुना है लाल हो जाते हैं टेसु सुना है बौराने लगते हैं आमपाली सुनी तो बहुत है बसंत कहानी इसलिए ही तो खोजती रहती हॅू अक्सर धरा से नभ तक…
