कविता और कहानी
पिता का स्पर्श : अम्ब्रीश श्रीवास्तव
पिता भी करना चाहता है अपने बेटे को स्पर्श, बिल्कुल माँ की तरह,चूमना चाहता है मस्तक को, बिल्कुल माँ की तरह।अपनी गोद में बैठाकर, सहलाना चाहता है बालों को, बिल्कुल उसकी माँ की तरह।लेकिन समाज ने बाँध दिया पिता को कुछ ऐसी उलझनों में,कि वो समय ही न दे पाए, संतान से बंधने में।उसे दी…
मेहनत ही प्रकाश है
जब मेहनत से जी चुराता है इंसान,अपने जीवन का उद्देश्य भूल जाता है।फिर वह प्रकाश की राह छोड़,अंधकार की ओर बढ़ जाता है।इसलिए लग जाओ अपने कर्म में,स्वयं का लो तुम संग्यान।मेहनत से बढ़ाओ अपना ज्ञान,भटकने मत दो अपना ध्यान।समय की बर्बादी कर देगी तुम्हें बर्बाद,इसलिए कुछ बनने की ठान।आलस्य को भगाओ अपने से कोसों…
राजभाषा – हिंदी
बड़ी ही सरल है हिन्दी की परिभाषायह है भारत वर्ष की राजभाषासंस्कृत की है यह बेटी प्यारीशासन और प्रशासन की है राजदुलारीसंविधान में इसका दर्जा है बड़ा ही ऊंचासम्मान करता इसका भारत समूचासितम्बर माह में होता इसका बहुत ही महिमा मंडननहीं कर सकता कोई भी इस बात का खंडनसुर, तुलसी, निराला और दिनकर सरीखे सरस्वती…
आत्मविश्वास : -अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद की प्रतिष्ठित टेक कंपनी की सुबह हमेशा की तरह व्यस्त थी। सभी लैपटॉप, ई-मेल, ऑनलाइन मीटिंग और समय-सीमाओं के भीतर अपने लक्ष्य की दौड़ में व्यस्त थे।कंपनी की चकाचौंध में साधारण कपड़े पहने घबराया हुआ चेहरा और आँखों में कहीं नौकरी से न निकाल दिए जाने की आशंका लिए रवींद्रन हड़बड़ी में कई गड़बड़ियाँ…
हिन्दी भाषा को मेरा शत-शत नमन
मातृ भूमि को मेरा शत-शत नमनभारत भूमि को मेरा शत-शत नमनआर्य भूमि को मेरा शत-शत नमनहिन्दी भाषा को मेरा शत-शत नमन गांधी गौतम विवेकानंद, अभिमान हैंवसुधैव कुटुंबकम का मंत्र महान हैपल्लवित -पुष्पित ही रहे ये चमन निर्बाध संस्कारों की बहती शक्ति हैशौर्य इतना कि शहादत ही मुक्ति हैशत्रुओं का सदैव ही किया है दमन मन…
प्रेमचंद की १४६ वीं जयंती पर उनकी पत्नी को समर्पित
‘शिवरानी देवी’ कहावत है- “ हर सफल पुरुष के पीछे एक स्त्री का हाथ होता है।” तथा“ पुरुष की उन्नति में स्त्री का मौन किंतु अपरिहार्य योगदान निहित होता है।” इस कहावतों को चरितार्थ किया है प्रेमचंद की अर्द्धांगिनी शिवरानी देवी ने, जिन्होंने अपने मौन, संयमित एवं अनिवार्य योगदान से प्रेमचंद नामक विराट साहित्य पुरुष…
संस्मरण : गर्मी की छुट्टियां और बचपन
बहुत पहले की बात है। नेहा गर्मी की छुट्टियों में गांँव गई तो एक तो शहर से आने का रुतबा,दूसरा शहरी लड़की होने का एहसास उसे सबसे अलग कर रहा था। गाँव में शहर से आने वालों की कद्र कुछ ज्यादा ही होती थी। मानों आकाश से कोई भगवान ही उतर…
बंजर आत्मा (लघुकथा)
वह भीतर से चुप था — इतना चुप, कि अब उसकी आत्मा भी किसी आहट से नहीं कांपती थी। सावन की फुहारें बरसतीं तो थीं, पर अब उसकी आँखों में नमी नहीं बची थी। रिश्तों की मिट्टी को सींचते-सींचते वह स्वयं दरक चुका था। भीतर की धरती अब केवल दरारों से भरी थी — वहाँ…
प्रेम,love,attracfion : आशा सहाय
मेरे घर के बरामदे मे कपड़े सूखने के लिए टाँगीगई एक अलगनी पर एक अत्यंत छोटी सी चिरैया ने पंखों का एक छोटा सा घोंसला बना लिया अथवा यों कहूँ कि लटका लिया है।सफेद छोटे छोटे पंखों का एक आकर्षक घोंसला।आश्चर्य होता है कि कहाँ से उसने इतने छोटे छोटे पंख ढूँढे होंगे।मै चिकित्सीय कारणों…
